Tuesday, February 24, 2015

यातना अब और नहीं, कानून राज लागु करो!

मनुष्य का मनुष्य द्वारा यातना कमजोर के ऊपर मजबूत के द्वारा अपनी इच्छा को लागू करने का आवश्यक माध्यम है | (सर्वोच्च न्यायालय)

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने ठीक ही कहा है कि पुलिस एक चौराहे पर खड़ी है, जहाँ से वह मानवाधिकार की रक्षा कर सकती है या फिर उसका हनन|

प्रिय साथियों,
जैसा कि आप सभी भली-भांति जानते हैं कि भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के निष्पक्ष छवि एवं प्रजातांत्रिक मूल्यों के संवहन-संवर्धन एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के मज़बूतीकरण हेतू संयुक्त राष्ट्र में अन्तर्राष्ट्रीय यातना विरोधी कन्वेंशन (UNCAT) को भारत में लागू करने हेतू हस्ताक्षर किया है | किन्तु अभी तक अनुमोदन नहीं किया गया है/

जिसके क्रम में भारत सरकार ने अनुमोदन के मद्देनज़र 2010 में यातना विरोधी क़ानून को लागू करने के लिए विभिन्न सुझाव समितियों एवं माननीय सांसदों द्वारा सहमति हेतू प्रस्तावित किया था | यह विधेयक लोकसभा में तो पास हो गया है, लेकिन राज्य सभा में यह महत्वपूर्ण विधेयक अभी लंबित है और स्टेंडिंग कमेटी ने अपनी रपट दे दिया है | यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र समिति द्वारा पूरे विश्व के सभी देशों को यातना विरोधी कानून को अपने देश में लागू करने के लिए निर्देशित किया है | यातना के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र समिति ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि घरेलू क़ानून के अंतर्गत अपराध की परिभाषा को कम से कम संयुक्त राष्ट्र के यातना की परिभाषा के अनुरूप होना चाहिये | संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार परिषद् के यूनिवर्सल पीरियोडिक रिव्यू (UPR) में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी कन्वेंशन (UNCAT) के अनुमोदन का वादा किया है/

      यह स्पष्ट है कि मानवाधिकार व कानून के राज को लागू करने की सबसे बड़ी एजेंसी पुलिस है| इसलिए आई०पी०सी० की धारा 330-331 के तहत पुलिस यातना/उत्पीड़न का निषेध है| वही पुलिस सी.आर.पी.सी. की धारा-161 के तहत अपराध स्वीकृति कराती है, तो साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 के तहत न्यायालय में साक्ष्य नहीं है, यदि वह मजिस्ट्रेट के सामने न नहीं दिए गए हैं | फिर यह सवाल उठता है कि आखिर पुलिस यातना/उत्पीड़न का सहारा क्यों लेती है?

पुलिस यातना से सम्बंधित कारणों में पुलिस विभाग में संसाधनों की कमी, राजनैतिक हस्तक्षेप एवं पुलिस विभाग से इतर एक निष्पक्ष व वैज्ञानिक जाँच एजेंसी की कमी प्रमुख कारणों में से हैं |इसके साथ ही साथ हमारा सामन्ती व पितृसत्तात्मक समाज खुद यातना/उत्पीड़न कि स्वीकारोक्ति देता है|
यातना/उत्पीड़न की परिभाषा संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी कन्वेंशन के अनुछेद 1(1) में वर्णित है| जिसके अनुसार कोई ऐसा कार्य जान बुझकर किसी व्यक्ति पर शारीरिक या मानसिक पीड़ा देना, जिसका उद्देश्य उससे या तीसरे व्यक्ति से अपराध स्वीकृति करना या ऐसे कार्य के लिए सजा देना, जो उसने या किसी तीसरे व्यक्ति ने किया हो या करने का संदेह हो | इसमे यदि अधिकारिक क्षमता वाले व्यक्ति का परोक्ष या प्रत्यक्ष भागीदारी होना शामिल है/

      किन्तु भारत में पुलिस उत्पीडन के इतिहास को देखें, तो 1857 के विद्रोह को दमनकारी तरीके से कुचलना व पुनः इसकी पुनरावृति नहीं हो, इसके लिए 1861 में पुलिस मैनुवल एक्ट बनाया गया और अंग्रेजी तानाशाही प्रणाली के थानों का निर्माण हुआ पुलिस विभाग का अध्ययन करें, तो देखेंगे कि जिन पदों पर अंग्रेजी पुलिस वाले हुआ करते थे और उनके पास जितनी ताकत हुआ करती थी, उतनी ही ताकत आज पुलिस उच्च अधिकारियो के पास है और जिन पदों पर भारतीय पुलिसकर्मी हुआ करते थे जिन्हें अंग्रेज पुलिसकर्मी भारतीय जनता को यातना देने के लिए मजबूर करते थे और जब चाहते थे भारतीय पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर या निलंबित कर दिया करते थे, उसी प्रकार आज आजादी के इतने वर्षो बाद भी भारतीय संविधान व भारतीय कानून में 1861 के पुलिस मैनुवल क़ानून में कोई भी संशोधन नहीं हुआ, जिसका पारिणाम है कि आज भी भारतीय पुलिस ब्रिटिश उपनिवेशवादी हुक्मरानों के पदचिन्हों पर चल रही है और जन विरोधी प्रशासन के इशारों पर किसी भी प्रकार के लोकतांत्रिक आवाज को कुचल दिया जाने का कार्य ही उनका प्रमुख सिद्धत बन गया है/

      वही सी.आर.पी.सी. की धारा 176(ए) में संशोधन कर हिरासत में मौत के हर मामले की न्यायिक जाँच का प्रावधान किया गया है, किन्तु पुरे उ० प्र० में यह किसी मामले में लागू नहीं हो रहा है| साथ ही सी.आर.पी.सी. की धारा 97 के तहत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी हिरासत के मामले में मजिस्टेट द्वारा सर्च वारंट का प्रावधान है| वही डी०के० बसु बनाम पश्चिम बंगाल में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी के समय आवश्यक निर्देश जारी किये है, जिसका अनुपालन पुलिस द्वारा अनिवार्य है | राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एनकाउंटर” के मामले में पुलिस पर भी प्राथमिकी दर्ज करते हुए निष्पक्ष संस्था से जाँच का निर्देश दिया है| हिरासत व जेल में मौत के पोस्टमार्टम कि रपट कि विडियोग्राफी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजने का निर्देश है| ह्यूमन राइट्स एक्ट की धारा 18 के तहत मानवाधिकार हनन के मामले में अंतरिम राहत का प्रावधान है| संविधान का अनुछेद-21 गरिमापूर्ण व सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है/

अगर आकड़ो को देखें, तो अधिकांश यातना गरीब, मजलूम अल्पसंख्यकों, दलित व पिछडो को दी जाती है| हाल के आंकड़े चिंता का विषय हैं कि वर्त्तमान में भारतीय जेलों में गरीब, दलित, आदिवासी तथा अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के कैदियों की संख्या सबसे अधिक है | जबकि बड़े माफिया प्रभावशाली अपराधी तत्व इसके शिकार नहीं होते, केवल एक-दो अपवादों को छोडकर इससे साधारण जनता पुलिस भय से आक्रांत रहती है और पुलिस प्रभावशाली तत्वों से मिलकर समाज में भ्रष्टाचार के द्वारा कानून के राज की धज्जियां उड़ा रही है| एक सभ्य समाज में बिना पुलिस यातना को रोके कानून का राज स्थापित नहीं किया जा सकता है | शासन-प्रशासन द्वारा पुलिस यातना को रोक पाने में असमर्थता एवं पुलिस यातना का जारी रहना वास्तव में भ्रष्टाचार के साथ जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसे भयावह स्थिति एवं कमज़ोर राज्य शासन को स्थापित करना है| जो पूर्णरुपेर्ण से कानून के राज के खिलाफ है|

आइये! हम मिलकर पुलिस की यातना को खत्म करने पुलिस सुधार और कानून के राज को लागू करने के संघर्ष को आगे बढ़ाये|

आप क्या कर सकते है?
1.      26 जून को धरना प्रदर्शन, संगोष्ठी, नुक्कड़ सभा के द्वारा पीछे वर्णित पत्र पर हस्ताक्षर कर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को भेजे व समाचार पत्रों में प्रेस विज्ञप्ति दें और अपनी गतिविधियों की सुचना हमें भी प्रेषित करें/
2.      भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र में 1997 में समझौते पर हस्ताक्षर किये है, किन्तु अभी तक अनुमोदित नहीं किया है| यातना विरोधी संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन समझौते 1997 के अनुमोदन हेतू राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को पत्र भेजे एवं दबाव हेतु धरना प्रदर्शन, संगोष्ठी, जुलुस आदि का आयोजन करे|
3.      अपने आस-पास हो रहे उत्पीडन एवं उससे जुड़े तंत्र व मानसिकता का विरोध करें इसकी सुचना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,सूचना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली को भी प्रेषित करें/
4.      समाचर पत्रों में यातना के विरुद्ध सम्पादक के नाम पत्र भेजे एवं समाचार प्रकाशित करायें
5.      यातना एवं उसके फलस्वरूप पुलिस उत्पीडन के खिलाफ प्रचार-प्रसार करे एवं जुड़ी घटनाओ के तथ्यों का आकलन का रपट समाचार पत्रों, सरकार पत्रों, सरकार आयोग व समिति प्रेषित करे|
6.      सर्वोच्च न्यायलय के निर्देशो व आदेशो, यातना विरोधी कानून, अन्तराष्ट्रीय घोषणाओं के बारे में लोगो को जानकारी दे/
7.      पुलिस आयोग कि रपट लागू करना और पुलिस विभाग में निष्पक्ष जाँच के लिए निष्पक्ष एजेंसी का गठन के लिए दबाव बनाना|
8.      पुलिस विभाग को कानून का राज लागू करने के लिए संसधनो को मुहैया कराने के लिए शासन पर दबाव बनाना/
9.      पुलिस के काम के घंटे निर्धारित कर उन्हें अनुकूल माहौल में काम करने व मानसिक पुनर्वास हेतू सरकार को नीति-नियम स्तर पर बदलाव हेतू पैरवी करना /
10.  जनमित्र पुलिसिंग तंत्र विकसित करने हेतू स्वयंसेवी संघठनो एवं संस्थाओं शैक्षणिक ईकाइयों के साथ सामंजस्यपूर्ण राज्य व जिले स्तर पर यूनिट बनाया जाने हेतू सरकार से पैरवी व जन दबाव बनाना/ 
 
जारीकर्ता:- मानवाधिकार जननिगरानी समिति/जनमित्र न्यास, सा० 4/2 ए० दौलतपुर वाराणसी – 221002 (उ०प्र०) |